हारी नहीं पूरी तरह से जी कर गईः मैं हार गई की कलमकार

-सारथी-

मैं हार गई जैसी कालजयी रचना की कथाकारा। वो अपनी जिंदगी से हार गईं.. ये शायद उस रचनाकार के लिये कहना बेइंसाफी होगी। वो जिंदगी से नहीं हारीं। उन्होंने जिंदगी को खूब जिया.. और बखूबी जिया। अपनी शर्तों पर जिया। किसी की धौंस में कभी नहीं आईं। 90 वर्ष पूरी कर चुकीं मन्नू भण्डारी अब हमारे बीच नहीं रहीं। दुनिया को अपनी नजरों से देखना.. अपने आसपास की गतिविधियों को संजीदगी से देखना और उन्हें पूरी शिद्दत के साथ अपयाणा के गुड़गांव के एक निजी अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस लीं। उनकी बेटी रचना यादव ने पीटीआई-भाषा को फोन पनी रचनाओं में ढाल लेना ये किसी मंजे हुए रचनाकार का ही काम हो सकता है। मन्नू भण्डारी वही थीं। आज ही दोपहर हरिर बताया कि वह करीब दस दिनों से बीमार थीं। रचना ने बताया कि उनका अंतिम संस्कार मंगलवार को दिल्ली के लोधी रोड स्थित श्मशान घाट में किया जाएगा।

3 अप्रैल 1939 का दिन था वह। जब मन्नू का जन्म मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के भानपुरा गांव में हुआ था। बचपन में उन्हें लोग महेंद्र कहकर पुकारते थे बल्कि यों कह लें कि उनका वास्तविक नाम महेंद्र कुमारी था। लेखन की दुनिया में आने के बाद उन्होंने अपना नाम मन्नू रख लिया था।

उनकी प्रसिद्ध कहानियों का संग्रह है – एक प्लेट सैलाब, मैं हार गई, तीन निगाहों की एक तस्वीर, यही सच है, त्रिशंकु, श्रेष्ठ कहानियाँ, आँखों देखा झूठ, नायक खलनायक विदूषक। उनके प्रसिद्ध उपन्यासों में आपका बंटी और महाभोज बहुत ही चर्चित हैं। उनके द्वारा लिखित अन्य उपन्यास स्वामी, एक इंच मुस्कान, कलावा और एक कहानी यह भी हैं। उन्होंने रजनी, निर्मला, स्वामी, दर्पण फिल्म के लिये पटकथाएं भी लिखीं थीं। बिना दीवारों का घर उनके द्वारा लिखित प्रसिद्ध नाटक है जो अपने समय में काफी चर्चे में रहा।
एक इंच मुस्कान उन्होंने लेखक स्वर्गीय राजेंद्र यादव के साथ मिलकर सांझा तौर पर लिखा था। मन्नू जी लिखित ‘यही सच है’ कहानी पर एक फिल्म भी बनी थी जिसका नाम था रजनीगंधा। आपको बता दें 1974 में इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला था। उन्हें हिंदी अकादमी दिल्ली से शिखर सम्मान प्राप्त हुआ। वहीं बिहार सरकार, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने भी उन्हें उनकी कृतियों के लिये सम्मानित किया था। आपको बता दें मन्नू भंडारी का विवाह राजेंद्र यादव जी से हुआ था। राजेंद्र यादव जो साहित्य की दुनिया में एक प्रख्यात नाम है जिन्होंने सारा आकाश उपन्यास लिखा था और उस पर फिल्म भी बनी थी। खैर बाद में राजेंद्र व मन्नू जी की शादी टूट गई थी। पति-पत्नी के बीच विवाद का एक बच्चे पर क्या असर पड़ता है इसी पर मन्नू जी ने उपन्यास लिखा था ‘आपका बंटी’ जो उन्हें साहित्य जगत की सर्वोच्च ऊँचाई पर पहुंचा दिया था। मां-बाप के बीच चल रहे तनावपूर्ण माहौल को झेल रहे यह उपन्यास सिर्फ बंटी की कहानी नहीं है बल्कि यह बंटी के मां की भी कहानी है, बंटी की मां शकुन की कहानी है। यह उपन्यास 1970 में लिखा गया था। धर्मयुग पत्रिका में यह धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुआ था। आपका बंटी पर ही ‘समय की धारा’ नामक फिल्म बनी थी जो 1986 में रिलीज हुई थी। इस फिल्म के बनने के बाद मन्नू भंडारी संतुष्ट नहीं थी। उनका कहना था कि फिल्म में बंटी की मृत्यु हो जाती है जबकि उपन्यास में ऐसा नहीं था। उनकी कहानी के साथ कोई छेड़छाड़ करे यह उनको कत्तई पसंद नहीं था। हारकर उन्होंने अदालत में मामला दायर कर दिया था। काफी समय तक यह केस चला। आखिरकार मन्नू भंडारी को इसमें जीत मिली। उस समय उच्च न्यायालय ने कॉपीराइट एक्ट के तहत जो फैसला सुनाया वह लेखकों के लिये एक वरदान साबित हुआ। हालांकि जीत इनके पक्ष में होने के बावजूद उक्त फिल्म बनाने वाली कंपनी ने ज्यादा नुकसान और बदनामी के डर से अदालत के बाहर ही इनसे अनुनय-विनय कर केस को रफा-दफा कर लिया था। मन्नू जी को समझने के लिये उनकी रचनाओं को पढ़ना बेहद जरूरी है। बिना उनको पढ़े उनके व्यक्तित्व का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। एक कहानी या एक उपन्यास पढ़कर भी उनके व्यक्तित्व का कोई भी अंदाजा नहीं लगा सकता। कई बार उनकी रचनाएं बेहद जीवंत होने के बावजूद उन रचनाओं की सारगर्भिता से उनके व्यक्तिगत जीवन का दूर-दूर तक नाता नहीं होता था। यही थीं मन्नू भंडारी।
आइये थोड़ा बहुत आपका बंटी के माध्यम उनकी रचना की गंभीरता के बारे में समझते हैं। आपका बंटी उनके अपने व्यक्तिगत मगर वैवाहिक जीवन को ही कहीं न कहीं कटघरे में ला खड़ा करता है। छुट्टियां खत्म होने के बाद जब बंटी स्कूल जाता है तो उसे लगता है कि वह एक पिंजरे से आजाद हुआ पंछी है। वह इसलिये कि जितने दिन तक छुट्टियां रहती हैं वह हर तरफ से एक बंदिश में रहता है। पारिवारिक स्तर पर हमेशा तनावपूर्ण माहौल रहता है। स्कूल पहुंचने के बाद जब उसकी अन्य छात्र-बंधुओं से मुलाकात होती है तो सभी छात्र छुट्टियों में कहां घुमें क्या किये क्या खरीदे इस बात पर चर्चा करते रहे जबकि बंटी के पास अपने दोस्तों के बीच कहने के लिये कुछ भी नहीं था। वह क्या बताता कि हमारे घर में इन छुट्टियों भर मम्मी-पापा के बीच कलह होता रहा, घर में अन्य सदस्यों के बीच आपसी कलह होता रहा। आमतौर पर बच्चे स्कूल के पहले दिन ही स्कूल जाने से कतराते हैं जबकि बंटी स्कूल खुलता है तो घर से निकलने पर उसे तनावपूर्ण माहौल से आजादी मिल जाती है और वह राहत की सांस लेता है। हां, जब वह स्कूल से नयी किताबें लेकर घर पहुंचता है तो जैसे उसकी खुशियां वापस लौटकर आ जाती हैं। इस बात को मन्नूजी ने बहुत ही गहराई से अपने उपन्यास के कथानक के माध्यम से बयां किया है।
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