SIR बिहार–बंगाल में एक ही प्रक्रिया, दो अलग नियम को लेकर चुनाव आयोग पर ममता बनर्जी का तीखा हमला, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी का आरोप
कोलकाता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने चुनावी मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) अभियान को लेकर पर गंभीर और कड़े आरोप लगाए हैं। मुख्यमंत्री का कहना है कि एक ही SIR प्रक्रिया के तहत बिहार और बंगाल में अलग-अलग दिशानिर्देश लागू किए जा रहे हैं, जो सीधे तौर पर भेदभाव को दर्शाता है।
नबान्न (राज्य सचिवालय) में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता बनर्जी ने कहा कि जो दस्तावेज़ बिहार में वैध माने जा रहे हैं, वही बंगाल में अमान्य घोषित किए जा रहे हैं। उन्होंने आयोग पर राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगाते हुए उसे “कैप्चर कमीशन” और “तुगलक़ी फ़रमानों से चलने वाला आयोग” तक कहा।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी का आरोप
मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के निर्देशों का पालन नहीं कर रहा है। उन्होंने बताया कि बंगाल में SIR अभियान के खिलाफ उन्होंने स्वयं सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, लेकिन इसके बावजूद आयोग की कार्यप्रणाली में बदलाव नहीं दिख रहा।
“AI के ज़रिये 58 लाख नाम हटाए गए”
ममता बनर्जी का दावा है कि AI तकनीक का दुरुपयोग कर ड्राफ्ट मतदाता सूची से 58 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, जिनमें बड़ी संख्या में वैध मतदाता भी शामिल हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इससे राज्य में “डर और दबाव का माहौल” बनाया जा रहा है और लोकतांत्रिक व्यवस्था को नुकसान पहुँचाया जा रहा है।
निलंबित अधिकारियों पर भी आयोग से टकराव
चुनाव आयोग द्वारा सात सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (AERO) को निलंबित किए जाने पर भी मुख्यमंत्री ने नाराज़गी जताई। उनका कहना है कि अधिकारियों को बिना सुनवाई का अवसर दिए निलंबित किया गया। ममता बनर्जी ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार ऐसे अधिकारियों को पदोन्नति देगी।
सूत्रों के मुताबिक, यह पहला मौका है जब आयोग ने सीधे तौर पर बंगाल के चुनाव ड्यूटी में लगे अधिकारियों को निलंबित किया है, जबकि आम तौर पर इस तरह की कार्रवाई के लिए राज्य सरकार से सिफ़ारिश की जाती रही है। आयोग का तर्क है कि कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में अयोग्य और फर्जी मतदाताओं के नाम जोड़े जाने से 28 फरवरी को प्रकाशित होने वाली अंतिम मतदाता सूची पर सवाल खड़े हो गए हैं।
FIR के निर्देश और दिल्ली तलब
आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि कुछ अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज कराई जाए। इस सिलसिले में मुख्य सचिव को दिल्ली बुलाया गया, जहाँ उन्होंने आयोग के समक्ष अब तक निर्देशों के पालन में हुई देरी के कारण बताए।
क्यों अहम है यह विवाद?
- यह मुद्दा आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूची की विश्वसनीयता से जुड़ा है
- राज्य–केंद्र टकराव और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर बहस तेज़
- AI के इस्तेमाल और डेटा पारदर्शिता पर नए सवाल
यह पूरा विवाद अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं, बल्कि लोकतंत्र, निष्पक्ष चुनाव और संघीय ढांचे से जुड़ा बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है।

